
किसी सड़क पर एक लड़की मदद के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रही हो और उसके चारों तरफ खड़े लोग उसे बचाने के बजाय उसे घेरकर परेशान कर रहे हों—तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि अपराधी कौन थे?
सवाल यह भी होना चाहिए कि हम किस तरह का समाज बना रहे हैं?
बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम दो नाबालिग छात्र—एक लड़की और एक लड़का—को कथित तौर पर युवकों के एक समूह ने रास्ते में रोक लिया। दोनों को घेरा गया, उनके साथ मारपीट और बदसलूकी की गई और घटना का वीडियो भी बनाया गया। वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और आरोपियों की तलाश शुरू की। पुलिस के अनुसार कई लोगों की पहचान की गई और गिरफ्तारियां भी हुईं।
लेकिन इस पूरी घटना का सबसे डरावना हिस्सा सिर्फ वह हिंसा नहीं है जो वीडियो में दिखाई देती है।
डरावना यह है कि इतने सारे लोग मौजूद थे, फिर भी इंसानियत कहीं दिखाई नहीं दी।
अकेला व्यक्ति अपराध करने से पहले शायद सौ बार सोचता है।
लेकिन वही व्यक्ति जब भीड़ का हिस्सा बन जाता है, तो उसका व्यक्तिगत विवेक धीरे-धीरे गायब होने लगता है।
उसे लगता है—
"मैं अकेला थोड़ी हूँ।"
और यही सोच खतरनाक है।
जमुई की घटना में भी एक समूह ने दो नाबालिगों को घेरा। लड़की मदद की गुहार लगाती रही, लेकिन उसके आसपास मौजूद लोगों में से किसी ने उस स्थिति को रोकने की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ली। वीडियो में समूह द्वारा दोनों को परेशान किए जाने के दृश्य सामने आए हैं।
भीड़ अपराध को सिर्फ आसान नहीं बनाती, कई बार अपराधी को यह भ्रम भी देती है कि जिम्मेदारी किसी एक की नहीं है।
लेकिन अपराध भीड़ नहीं करती।
अपराध करने वाला हर व्यक्ति करता है।
इस घटना का एक और पहलू आज के डिजिटल समाज के लिए बेहद असहज सवाल खड़ा करता है।
घटना को कैमरे में रिकॉर्ड किया गया और बाद में उसके वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। पुलिस ने भी वीडियो के आधार पर जांच आगे बढ़ाई और आरोपियों की पहचान की।
सोचिए, उस समय वहां मौजूद किसी व्यक्ति के हाथ में फोन था।
वह फोन मदद के लिए भी इस्तेमाल हो सकता था।
पुलिस को कॉल करने के लिए भी।
लेकिन कैमरा चल रहा था।
यह सिर्फ तकनीक की समस्या नहीं है। यह उस मानसिकता का सवाल है जिसमें हर घटना को 'कंटेंट' में बदल देने की भूख पैदा हो गई है।
किसी का दर्द, किसी की बेइज्जती, किसी की चीख—सब कुछ कैमरे के फ्रेम में कैद किया जा सकता है।
फिर वही वीडियो शेयर होगा।
लोग देखेंगे।
कमेंट करेंगे।
फॉरवर्ड करेंगे।
और पीड़ित?
वह शायद जिंदगी भर उस घटना के साथ जीता रहेगा।
किसी की जिंदगी हमारी टाइमलाइन का कंटेंट नहीं है।
हमारे घरों में बेटियों को बचपन से बहुत कुछ सिखाया जाता है—
"अंधेरा होने से पहले घर आना।"
"किसी अनजान जगह मत जाना।"
"कपड़े संभालकर पहनना।"
"अकेले मत जाना।"
"सावधान रहना।"
लेकिन एक सवाल बहुत कम पूछा जाता है—
हम अपने बेटों को क्या सिखा रहे हैं?
क्या हमने उन्हें यह समझाया कि किसी लड़की को छूने से पहले उसकी सहमति जरूरी है?
क्या हमने उन्हें बताया कि किसी लड़की का रास्ता रोकना, उसे घेरना, उसका वीडियो बनाना या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे छूना 'मस्ती' नहीं है?
क्या हमने उन्हें यह सिखाया कि किसी महिला की स्वतंत्रता पर हमारा कोई अधिकार नहीं है?
बेटियों को सुरक्षित रहने की जिम्मेदारी देना जरूरी हो सकता है।
लेकिन सिर्फ बेटियों को सावधान करना समाधान नहीं है।
बेटों को जिम्मेदार बनाना भी उतना ही जरूरी है।
इस घटना का एक और सवाल उन लोगों से है जो ऐसे मामलों में सिर्फ वीडियो देखते हैं, कुछ देर गुस्सा करते हैं और फिर अपनी जिंदगी में लौट जाते हैं।
अगर सड़क पर किसी लड़की के साथ गलत हो रहा है और हम सिर्फ इसलिए आगे निकल जाते हैं क्योंकि वह हमारी बहन, बेटी या दोस्त नहीं है, तो समस्या सिर्फ अपराधियों में नहीं है।
समस्या हमारे भीतर भी है।
हर घटना में सीधे हस्तक्षेप करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। कभी स्थिति खतरनाक भी हो सकती है। लेकिन मदद के रास्ते हमेशा हो सकते हैं—पुलिस को सूचना देना, आसपास के लोगों को जुटाना, सुरक्षित दूरी से सहायता बुलाना या पीड़ित को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की कोशिश करना।
मूकदर्शक होना और सुरक्षित तरीके से मदद करना—दो अलग चीजें हैं।
और समाज का चरित्र इसी अंतर से तय होता है।
जमुई मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की, आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की कार्रवाई की तथा जांच के लिए SIT भी गठित की गई। बाद की कार्रवाई में मुख्य आरोपी के पुलिस मुठभेड़ में घायल होकर गिरफ्तार किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई।
कानून अपना काम करेगा।
अदालतें अपना काम करेंगी।
दोष सिद्ध होने पर सजा भी होगी।
लेकिन एक सवाल फिर भी बचा रहेगा—
अगली बार ऐसी घटना होने से पहले हम क्या बदलेंगे?
क्योंकि हर अपराध के बाद आरोपी को पकड़ लेना जरूरी है।
लेकिन उससे भी जरूरी है कि समाज ऐसी मानसिकता पैदा ही न करे, जिसमें किसी कमजोर व्यक्ति को घेरकर उसका अपमान करना 'मस्ती' समझा जाए।
हम अपने बच्चों को गणित पढ़ाते हैं।
अंग्रेजी पढ़ाते हैं।
करियर बनाना सिखाते हैं।
प्रतियोगिता में आगे निकलना सिखाते हैं।
लेकिन शायद हमें एक और विषय गंभीरता से पढ़ाना होगा—
अपने बेटों को यह बताना होगा कि ताकत किसी कमजोर को डराने में नहीं है।
ताकत यह है कि जब बाकी लोग किसी को घेर रहे हों, तब तुम उसके लिए खड़े हो सको।
जब बाकी लोग वीडियो बना रहे हों, तब तुम मदद के लिए फोन उठा सको।
जब बाकी लोग हंस रहे हों, तब तुम्हें समझ आए कि सामने वाला इंसान है—कंटेंट नहीं।
जमुई की घटना को सिर्फ एक वायरल वीडियो समझकर आगे बढ़ जाना आसान है।
लेकिन अगर हमने उससे कुछ नहीं सीखा, तो यह सिर्फ एक घटना नहीं रहेगी।
यह हमारे समाज की आदत बन जाएगी।
और जिस दिन किसी लड़की की चीख हमें सामान्य लगने लगेगी, उस दिन समस्या सिर्फ अपराधियों में नहीं होगी।
समस्या हम सब में होगी।
एनकाउंटर, गिरफ्तारी और जेल—ये कानून के हिस्से हैं।
लेकिन सामाजिक इलाज हमारे घरों से शुरू होगा।
क्योंकि अगली बार सड़क पर कोई मदद के लिए हाथ जोड़े, तो उसके आसपास सिर्फ भीड़ नहीं होनी चाहिए।
उसे इंसान भी मिलना चाहिए।
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